कोरोना से बचाव कोरंटाइन है,आखिर क्या है कोरंटाइन?

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कोरोना की कोई एंटीबायोटिक नही होने के कारण स्वास्थ्य विशेषज्ञ कोरंटाइन को ही बचाव का सबसे अच्छा तरीका बता रहे हैं। उन लोगों को कोरंटाइन किया जाता है, जो किसी भी तरीके से कोरोना मरीजों के सम्पर्क में आए हों। उत्तराखंड में भी कुछ लोग इससे गुजर रहे है। तो कुछ लोग इसे सजा मानकर बच रहे हैं। जबकि, यह सजा नहीं, बल्कि संबंधित व्यक्ति और उसके परिवार के लिए जरूरी है। बॉलीवुड की कई हस्तियां भी कोरंटाइन का समर्थन कर रही हैं।
कोरंटाइन या उपचार की अनदेखी,लगेगा भारी जुर्माना
कोरोना को सरकार द्वारा महामारी घोषित किया जा चुका है। यदि कोई व्यक्ति इन निर्देशों के बावजूद कोरंटाइन या इलाज से माना करता है तो प्रशासन के पास उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का भी अधिकार है। देश में कुछ जगह कोरंटाइन से भागने वाले मरीजों के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज की जा चुकी है
कोरंटाइन का मतलब यह होता है 
कोरंटाइन के तहत व्यक्ति को 14 दिन तक अकेले रहने को कहा जाता है, ताकि यदि संबंधित व्यक्ति को संक्रमण हो तो, वह दूसरे लोगों से उसका सम्पर्क ना हो सके।
इसके तहत लोगों को अपने घर के एक कमरे तक सीमित रहने को कहा जाता है, जिसमें बकायदा शौचालय की सुविधा भी उपलब्ध हो। और बस , यह ध्यान रखना है कि व्यक्ति खुद सफाई का ध्यान रखे, साथ ही कमरे में कोई दूसरा न आए और यदि बहुत जरूरी हो तो मास्क पहनकर पूरी एहतियात से ही आए। उत्तराखंड में विदेश से आए लोगों या संदिग्ध मरीजों के भी सम्पर्क में आए लोगों को अनिवार्य तौर पर 14 दिन कोरंटाइन के निर्देश दिए जा रहे हैं।
मेडिकल टीम इस दौरान हर रोज फोन के जरिये हाल-चाल पूछती है साथ ही इसमे एक राहत की बात होती है कि व्यक्ति पर खानपान या जीवनशैली से जुड़े सामान्य काम पर कोई प्रतिबंध नहीं होता। बीमारी के लक्षण दिखाई देने तक, मेडिकल टेस्ट भी नहीं होते। मेडिकल टीम संबंधित व्यक्ति से हर रोज दूरभाष के जरिये हाल-चाल पूछती है। सब सामान्य होने पर 14 दिन बाद व्यक्ति को मुक्त कर दिया जाता है। अलबत्ता, यदि बीमारी के लक्षण फिर दिखें तो जरूरी जांच की जाती है। कोरोना की पुष्टि हो जाने पर मरीज को अस्पताल में भर्ती किया जाता है।
धस्माना बोले, कोई परेशानी नहीं, केवल संयम जरूरीकोरोना के मरीजों से मिलने की वजह
से कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना को प्रशासन ने सबसे पहले कोरंटाइन किया था। धस्माना पांच दिन से अपने घर पर एक कमरे में अकेले रह रहे हैं। धस्माना ने फोन पर कहा, सारी दिनचर्या नियमित है और व्यायाम भी कर रहे हैं। संयुक्त परिवार के बावजूद किसी से नहीं मिल रहे। पत्नी मास्क पहनकर खाना लाती हैं और मेडिकल टीम रोजाना फोन पर हाल पूछती है। अभी टेस्ट की नौबत नहीं आई है। सकारात्मकता के लिए वह गीता पढ़ रहे हैं। अगर किसी व्यक्ति को भी ऐसा करने को कहा जाता है तो उन्हें आगे आना चाहिए। यह सजा नहीं है।
विदेश से लौटे या कोरोना के मरीजों के संपर्क में आए लोगों को कोरंटाइन करने का मुख्य मोटिव होता है कि संक्रमण का प्रसार रोका जाए। इससे किसी को भी घबराने की जरूरत नहीं है। यह आपके और आपके परिवार के लिए बहुत जरूरी है। कोरंटाइन घर पर ही होता है और इससे घबराने की बजाय संयम बरतना जरूरी है

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