पलायन की मार से सिकुड़ रहा सरकारी शिक्षा का दायरा, कभी बच्चों की चहल-पहल से गूंजने वाले स्कूलों पर लटके ताले; टिहरी और पौड़ी सबसे ज्यादा प्रभावित
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों से हो रहे पलायन की एक बेहद चिंताजनक और भावुक कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। जिन सरकारी स्कूलों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, जहां सुबह की प्रार्थना और पढ़ाई की आवाजें गांवों की पहचान हुआ करती थीं, आज वहां सन्नाटा पसरा है। पिछले एक दशक में प्रदेश के 1,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं या दूसरे विद्यालयों में समायोजित कर दिए गए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन और सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की घटती संख्या है।
सरकार की ओर से विधानसभा में दी गई जानकारी और सरकारी शिक्षा संबंधी आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में ही प्रदेश के 826 सरकारी प्राथमिक विद्यालयों पर ताले लग चुके हैं। इन विद्यालयों के बंद होने की प्रमुख वजह शून्य छात्र नामांकन रही। यानी कई स्कूल ऐसे थे, जहां पढ़ने के लिए एक भी बच्चा नहीं बचा था।
पहाड़ी जिलों में सबसे ज्यादा असर
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, स्कूलों के बंद होने का सबसे अधिक असर पहाड़ी जिलों में देखने को मिला है। टिहरी गढ़वाल में सबसे ज्यादा 262 स्कूल बंद हुए हैं। वहीं पौड़ी गढ़वाल में 120, पिथौरागढ़ में 104 और अल्मोड़ा में 83 सरकारी स्कूल बंद हुए।
मैदानी जिलों की स्थिति अपेक्षाकृत अलग है। देहरादून में 38 और हरिद्वार में केवल दो सरकारी स्कूल बंद होने की जानकारी सामने आई है। यह आंकड़े पहाड़ और मैदान के बीच पलायन तथा जनसंख्या के असंतुलन को भी दर्शाते हैं।
पलायन ने छीन ली स्कूलों की रौनक
पहाड़ों में रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा की तलाश में परिवार लगातार गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसका सीधा असर गांवों की आबादी और बच्चों की संख्या पर पड़ा है। कई गांवों में परिवारों की संख्या घटने के साथ ही स्कूलों में विद्यार्थियों का नामांकन भी लगातार कम होता चला गया।
इसके अलावा निजी स्कूलों की ओर अभिभावकों का बढ़ता रुझान, सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, एकल शिक्षक व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी छात्र संख्या घटने के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
5,800 से अधिक स्कूलों में 20 से भी कम छात्र
चिंता की बात यह है कि प्रदेश में अभी भी 5,800 से अधिक सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां विद्यार्थियों की संख्या 20 से कम रह गई है। यह स्थिति भविष्य में सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है।
सवाल सिर्फ स्कूल बंद होने का नहीं, पहाड़ों के भविष्य का भी है
सरकारी स्कूलों का बंद होना केवल शिक्षा विभाग के आंकड़ों तक सीमित मामला नहीं है। यह पहाड़ों से घटती आबादी, खाली होते गांवों और कमजोर पड़ते ग्रामीण सामाजिक ढांचे की भी कहानी है। स्कूल किसी भी गांव की पहचान और उसके भविष्य का आधार होते हैं। ऐसे में जब स्कूल बंद होते हैं तो यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या आने वाले समय में पहाड़ों के गांवों में फिर से बच्चों की किलकारियां गूंज पाएंगी?
उत्तराखंड के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ स्कूलों को संचालित रखने की नहीं, बल्कि पहाड़ों में ऐसी परिस्थितियां तैयार करने की है, ताकि लोग अपने गांवों में रह सकें और आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रह सकें।





